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श्रमिक असंतोष का मुख्य कारण पूंजीपतियों का दमन और सरकार की ढुलमुल नीति है - एस डी त्यागी

Posted by : pramod goyal on : Tuesday, 14 April 2026 0 comments
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फरीदाबाद।  पहली अप्रैल 2026 के बाद से गुरूगांव, फरीदाबाद तथा नोएडा के औद्योगिक संस्थानों में काम करने वाले ‌‌श्रमिको जबरदस्त असंतोष पैदा हो गया है। जिससे श्रमिक अपने औद्योगिक संस्थानों में हड़ताल पर चले गए और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करके सरकार से वेतन बढ़ाकर देने की मांग की गई। क्योंकि अनेक कम्पनीयो ने सरकार द्वारा बढ़ाया गया वेतन देने से मना कर दिया था। यहां यह बताना भी जरूरी है कि कुछ ‌ऐसे ही कम्पनी वाले श्रमिकों को पुराने वेतनमान भी नहीं दे रहे थे। उसमें अनावश्यक कटोती  ठेकेदारो द्वारा किया जाता रहा था। यह विद्रोह का मुख्य कारण रहा ह। सरकार और पुलिस विभाग भी श्रमिकों को न्याय दिलाने में असक्षम रहा है। कोई भी संस्था श्रमिकों के साथ होने वाले अनुचित श्रम व्यवहार को रोकने के बजाय उसे बढ़ावा देने वाली नीतियों को ही बढ़ावा देती है। 

हिन्द मजदूर सभा के प्रदेश प्रधान एस डी त्यागी का कहना है राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महंगाई दर सबसे ज्यादा है, जिसका कोई समायोजन नहीं है। सबसे ज्यादा जिम्मेदार इस आन्दोलन के लिए वह फैक्ट्री मालिक है जिन्होंने अखबारों में बयान बाजी करके श्रमिकों को मिलने वाली मामूली वेतन वृद्धि का विरोध किया है। सरकार को उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। त्यागी ने कहा कि इनके दो चेहरे हैं, सामने कुछ और पीछे कुछ।  अनाप-शनाप बोलने वाले समाज में कलंक है। सरकार भी इस मामले ढुल मुल रवैया अपना कर अपनी छवि को ही बिगाड़ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर एक आधार वेतन निश्चित किया जाना है। घोषणा संसद भवन में भी कर दी गई।  परंतु कितना और कब होगा यह एक रहस्य बरकरार है। जिसके कारण भी औद्योगिक संस्थानों में अशांति उत्पन्न हो रही है। जितनी तत्परता चार श्रम संहिताओं को लागू करने में दिलचस्पी दिखाई, उतनी श्रमिकों की वेतन बढ़ाने और अन्य समस्याओं के समाधान में नहीं दिखाई जाती। श्रमिक ने ने कहा कि  क्या पूंजीपतियों के हित सरकारों के लिए सर्वोपरी है।  संतुलन बनाए रखना चाहिए ना कि पक्षपात पूर्ण रवैया अपनाया जाये। उधोगपतियोंको  लोन माफी और श्रमिको दंड - सजा, जेलों में ठूंस दिया जाता है। क्या किसी भ्रष्टाचार में डूबे उद्योग पतियों में किसी एक को दंडित किया गया है,आज तक नही।  उन्हें तो देश से भागने की सुविधा है या माफी की सुविधा उपलब्ध है। जबकि बैंक में जमा पैसे टैक्स भुगतान कर जनता के है। जमीन किसानों से छिनती है, उनके परिवार बच्चों को जब पेट भरने को छोटी मोटी नौकरी करने पर भी वेतन अन्य भत्ते सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। इसका मुख्य कारण है। मजदूरों की एकता को कुछ चंद पूंजीवादियों केसाथ  कथित नेताओं ने विभाजित किया हुआ है। झंड़े डंडे के नाम पर कुछ राजनीतिक दलों की साठ गांठ में बंधे हुए हैं। फिर न्याय नहीं मिल सकता क्योकि  मजदूर किसान को ही सदैव अपना बलिदान देना होता है। समाज व राष्ट्र के विकास की बुनियाद में सर्व प्रथम दोनों मेहनतकश लोगों का बलिदान है, यह कड़वा सत्य है। सदीयो की परम्परा है, इस शोषण ओर अत्याचार की। मालूम नहीं, इस देश के बहुसंख्यक मतदाता इस पर आत्मचिंतन कभी करेंगे या नहीं।  केवल सत्ता की अदला बदली से काम नहीं चलेगा। व्यवस्था को बदलना होगा। कमाने वाले लोगों को संसद भवन और विधानसभा में पहुंचना चाहिए और ओर मुठ्ठी भर पूंजीपतियों के दलालों को बाहर निकालने के लिए जातपात, सम्प्रदाय, क्षेत्रवाद, भाषावाद से उपर उठकर भारत भूमि जो सभी की माता है हम सब को पाल रही है इसके लिए हमें सभी स्वार्थ त्याग ने के लिए आगे आना होगा। 



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