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मां वैष्णो देवी मंदिर में नवरात्रों के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की भव्य पूजा अर्चना हुई

Posted by : pramod goyal on : Friday, 20 March 2026 0 comments
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 फरीदाबाद : नवरात्रों के दूसरे दिन माता वैष्णो देवी मंदिर फरीदाबाद में माता ब्रह्मचारिणी की भव्य पूजा अर्चना की गई. मंदिर संस्थान के प्रधान जगदीश भाटिया ने प्रातः कालीन पूजा अर्चना और हवन यज्ञ का शुभारंभ करवाया. इस अवसर पर आए हुए श्रद्धालुओं को नवरात्रों की शुभकामनाएं और बधाई भी दी गई. माता ब्रह्मचारिणी के दरबार में माता देखने के लिए विशेष तौर पर भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष राजकुमार वोहरा, दिनेश भाटिया फकीरचंद कथूरिया, उद्योगपति आर के बत्रा, नेतराम, कमल खत्री और मनोज सचदेवा मंदिर में उपस्थित हुए. इस शुभ अवसर पर जगदीश


भाटिया ने आए हुए अतिथियों को माता की चुनरी और प्रसाद भेंट किया. इसके उपरांत श्री भाटिया ने श्रद्धालुओं को मां ब्रह्मचारिणी की महिमा बताते हुए कहा कि मां ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में जलपात्र होता है. मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने से मनचाहा वरदान मिलता है. मां भक्तों के दुखों को हरने वाली और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं. मां ब्रह्मचारिणी को मीठे पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है. विशेष रूप से मां को दूध,  मिश्री से बनी मिठाइयों या पंचामृत का भोग लगाना शुभ माना जाता है.दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है. इस दिन हरे रंग के कपड़े पहनना अच्छा माना जाता है. हरा रंग शांति, विकास और समृद्धि का प्रतीक है.कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था. बचपन से ही उनका मन भगवान शिव को पाने के लिए समर्पित था. एक दिन नारद जी ने उन्हें शिव जी को पति रूप में पाने का मार्ग बताया, जिसके बाद देवी ने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया.मां ब्रह्मचारिणी ने हजारों वर्षों तक बहुत कठिन तप किया. शुरुआत में उन्होंने केवल फल और फूल खाकर जीवन बिताया. फिर उन्होंने सौ वर्षों तक सिर्फ जमीन पर रहकर सादा भोजन किया. इसके बाद उन्होंने गर्मी, सर्दी और बारिश की परवाह किए बिना तपस्या जारी रखी.कहा जाता है कि कई हजार सालों तक उन्होंने केवल बिल्वपत्र खाए और भगवान शिव की भक्ति करती रहीं. बाद में उन्होंने पत्ते खाना भी छोड़ दिया और बिना भोजन और पानी के तप करने लगीं. इस कठिन तपस्या के कारण उनका शरीर बहुत कमजोर हो गया था. उनका तप देखकर सभी देवता, ऋषि-मुनि अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने देवी को भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त करने का वरदान दिया. मां की इसी कठिन तपस्या के कारण उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा था. सच्चे मन से जो भी भक्त मां ब्रह्मचारी की पूजा अर्चना कर अपने मन की मुराद मांगता है वह अवश्य पूर्ण होती है.

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