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क्या कांग्रेस ने यह मान लिया है कि पंजाबी वर्ग अब उसका नहीं रहा? अगर नहीं, तो फिर बार-बार ऐसे अपमानजनक हालात क्यों पैदा किए जा रहे हैं?
आज कांग्रेस के बड़े नेता ज़मीनी सच्चाई से कट चुके हैं। एकजुटता दिखाने के नाम पर सिर्फ दिखावा हो रहा है। राज्यसभा चुनाव में जो हुआ, वह सिर्फ
एक हार नहीं थी—वह कांग्रेस की अंदरूनी सड़न का खुला प्रमाण था। दलित समाज के नेता को उम्मीदवार बनाना एक सही कदम था, लेकिन उसी चुनाव में क्रॉस वोटिंग, वोट कैंसिल होना और अपने ही विधायकों का भरोसा टूट जाना—यह किस ओर इशारा करता है?
एक हार नहीं थी—वह कांग्रेस की अंदरूनी सड़न का खुला प्रमाण था। दलित समाज के नेता को उम्मीदवार बनाना एक सही कदम था, लेकिन उसी चुनाव में क्रॉस वोटिंग, वोट कैंसिल होना और अपने ही विधायकों का भरोसा टूट जाना—यह किस ओर इशारा करता है?
दूसरी तरफ बीजेपी पूरी ताकत और रणनीति के साथ चौथी बार सरकार बनाने की तैयारी में लगी है। वहां संगठन है, अनुशासन है, स्पष्ट दिशा है। और यहां कांग्रेस में भ्रम, गुटबाजी और निष्क्रियता हावी है।
कितनी बार “किस्मत” का बहाना बनाकर अपनी नाकामी छुपाई जाएगी? यह कहना कि सामने वाले की किस्मत अच्छी थी, अपने ही कमजोर नेतृत्व और बिखरे संगठन पर पर्दा डालने जैसा है। हर बार किस्मत नहीं, बल्कि रणनीति और संगठन जीतता है—और कांग्रेस आज इन दोनों में पिछड़ चुकी है।
सोशल मीडिया पर एक फोटो डालकर यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि सब कुछ ठीक है। लेकिन सच्चाई यह है कि 9 वोट खिलाफ जाना, वोट कैंसिल होना और खुलेआम क्रॉस वोटिंग होना—यह सब कांग्रेस की जमीनी हकीकत बयां करता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि हरियाणा में पंजाबी समाज का कांग्रेस में कोई मजबूत चेहरा क्यों नहीं है? क्या उनकी आवाज़ दबा दी गई है या उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया है? अगर ऐसा ही चलता रहा, तो आखिर क्यों पंजाबी समाज कांग्रेस के साथ खड़ा रहेगा?
आज हरियाणा का पंजाबी वर्ग यह सोचने पर मजबूर है कि क्या कांग्रेस उनके सम्मान और भविष्य की गारंटी दे सकती है, या फिर उन्हें अपना रास्ता बदलना होगा।
अगर कांग्रेस अब भी नहीं जागी, तो यह सिर्फ एक वर्ग का नहीं, बल्कि पूरे संगठन के पतन की शुरुआत होगी।

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