फरीदाबाद। सूरजकुंड मेले में मौत का झूला बना यह झूला एक पुलिस इंस्पेक्टर की जान लील गया और दर्जन से अधिक से अधिक लोगों की सांसे अटक गई, जो विभिन्न अस्पतालों में उपचाराधीन है। आखिर दर्शकों से भरा यह झूला अचानक कैसे टूट गया। यह जांच का विषय है। खेर जाँच तो होती रहेगी। लेकिन इस तरह के हादसे रोकने के लिए किसकी जिम्मेदारी है , मेला प्रशासन की या फिर उन नेताओं और मंत्रियों की जो रोज मेला घूमने तो आते है लेकिन यहां की व्यवस्था का जायजा नहीं लेते है। अंतर्राष्ट्रीय सूरजकुंड मेले में ऐसा नहीं है कि झूला टूटने की यह वारदात पहली बार हुई है। इससे पहले 2001 में भी झूला टूटने से तीन लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन मेला प्रशासन ने इससे कोई सबक नहीं लिया और इस तरह का एक और हादसा फिर हो गया।
आखिर इस तरह के खतरनाक झूलों की अनुमति किसने और किस आधार पर दी थी। सवाल यह भी है कि झूलों की नियमित जांच होती भी या नहीं। अगर होती है तो कौन करता है और नहीं होती है तो क्यों नहीं। क्या मेला केवल मौज मस्ती के लिए है, दर्शकों की सुरक्षा की चिंता किसी कोई नहीं है। मेला प्रशासन हो या फिर दूसरे अधिकारी उन्हें तो केवल मेले में आने वाले बड़े नेताओ, अधिकारियो और मंत्रियो की तिमारदारी से फुर्सत नहीं है।

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