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हरियाणा में बीते विधानसभा चुनाव की तुलना भारी संख्या में गिरे मतदान प्रतिशत से राजनीतिक दल पसोपेश में हैं। जीत का दावा तो हर मुख्य दल कर रहा है, लेकिन कम मतदान ने बड़े नेताओं की धुकधुकी भी बढ़ा दी है। प्रदेश में ऐसा भी होता है कि जब कम मतदान हुआ तब भी पूर्व में तीनों लालों, ताऊ देवी लाल, बंसी लाल और भजन लाल की सरकारें सत्ता से बाहर हुईं और जब ज्यादा मतदान हुआ तो भी पूर्व सीएम हुड्डा ने 2005 और 2009 में सरकार बनाई।
साल 2014 में भारी मतदान हुआ तब भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत से पहली बार सत्ता में आने में सफल रही। इस बार बीते चुनाव की तुलना मतदाता में कम उत्साह और मतदान को लेकर निराशा को राजनीतिक दल भी नहीं भांप पाए। दलों के साथ ही चुनाव आयोग ने भी मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किए थे, लेकिन सफलता नहीं मिली। कम मतदान का गुणा भाग राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से अपने पक्ष में कर रहे हैं।
भाजपा दावा कर रही है कि उसका कार्यकर्ता अपने मतदाता को घर से निकालने में कामयाब रहा, जबकि विपक्षी अपने मतदाता को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में नाकाम रहे। जबकि, विपक्षी दल कांग्रेस, जजपा और इनेलो का दावा है कि सरकार के कामकाज से निराशा थी, इसलिए मतदाताओं ने अधिक मतदान नहीं किया। भाजपा का शहरी वोटर्स कम मतदान करने गया और गांवों में अधिक वोटिंग हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक वोटिंग को कांग्रेस, जजपा और इनेलो अपने पक्ष में मान रहे हैं। कम मतदान किसके पक्ष में रहता है, ये तो चुनाव नतीजों से ही साफ होगा।
भाजपा दावा कर रही है कि उसका कार्यकर्ता अपने मतदाता को घर से निकालने में कामयाब रहा, जबकि विपक्षी अपने मतदाता को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में नाकाम रहे। जबकि, विपक्षी दल कांग्रेस, जजपा और इनेलो का दावा है कि सरकार के कामकाज से निराशा थी, इसलिए मतदाताओं ने अधिक मतदान नहीं किया। भाजपा का शहरी वोटर्स कम मतदान करने गया और गांवों में अधिक वोटिंग हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक वोटिंग को कांग्रेस, जजपा और इनेलो अपने पक्ष में मान रहे हैं। कम मतदान किसके पक्ष में रहता है, ये तो चुनाव नतीजों से ही साफ होगा।

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