फरीदाबाद। अधिवक्ता एवं समाजसेवी डॉ. मोहन तिवारी ने अधिवक्ता कुणाल कांत शर्मा को 5 अगस्त को पुलिस उपायुक्त, ऊषा कुंडू के निर्देश पर सेंट्रल कार्यालय से थाना ले जाकर कथित रूप से करीब डेढ़ घंटे तक रोके जाने के मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली के समक्ष जनहित में उठाया है। अधिवक्ता डॉ. तिवारी ने आयोग में शिकायत देकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच कराने तथा घटना से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्यों और आधिकारिक अभिलेखों को सुरक्षित रखने की मांग की है।
शिकायत के अनुसार, अधिवक्ता कुणाल कांत शर्मा 5 अगस्त को दोपहर करीब 12:30 बजे पुलिस उपायुक्त, सेंट्रल कार्यालय पहुंचे थे। आरोप है कि पुलिस उपायुक्त, ऊषा कुंडू से किसी मामले को लेकर कहा सुनी हो गई जिसके बाद करीब एक बजे के बाद उन्हें वहां से थाना सेंट्रल, फरीदाबाद ले जाया गया और लगभग डेढ़ घंटे तक रोके रखा गया। अधिवक्ता तिवारी ने इस पूरी कार्रवाई के वैधानिक आधार, प्रक्रिया और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है।
इस मामले में अधिवक्ता डॉ. मोहन तिवारी द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत में पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच के साथ-साथ घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज, दैनिक डायरी, आगंतुक पंजिका एवं अन्य आधिकारिक अभिलेख सुरक्षित रखने की मांग की गई है। डॉ. तिवारी ने कहा कि शिकायत का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि जनहित में नागरिकों की स्वतंत्रता, अधिवक्ताओं की गरिमा और कानून के शासन की रक्षा सुनिश्चित कराना है।
उन्होंने कहा कि किसी भी नागरिक या अधिवक्ता को बिना स्पष्ट वैधानिक आधार और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करना गंभीर विषय है। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ नागरिकों के मौलिक अधिकारों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का भी पालन करना होता है।
अधिवक्ता डॉ. तिवारी ने कहा कि उन्होंने यह मामला किसी व्यक्तिगत विवाद के रूप में नहीं, बल्कि जनहित और विधि के शासन से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न के रूप में मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया है। उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को पुलिस द्वारा किसी स्थान पर रोका या थाने ले जाया जाता है तो उसके पीछे स्पष्ट कानूनी आधार, उचित प्रक्रिया और रिकॉर्ड का होना आवश्यक है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आवश्यकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि अधिवक्ता न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग हैं। अधिवक्ताओं के साथ होने वाली किसी भी कार्रवाई में उनकी गरिमा और पेशेवर स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। यदि किसी कार्रवाई में नियमों या निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच के बाद जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।इस प्रकरण को लेकर जिला बार एसोसिएशन, फरीदाबाद द्वारा भी पूर्व में न्यायिक कार्य से विरत रहकर स्ट्राइक कर विरोध दर्ज कराया गया था।
अधिवक्ता मोहन तिवारी ने आयोग से पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच कराने, संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट तलब करने, उपलब्ध रिकॉर्ड एवं सीसीटीवी फुटेज की जांच कराने तथा यदि किसी स्तर पर कानून या मानवाधिकारों का उल्लंघन पाया जाता है तो नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की है।
अधिवक्ता मोहन तिवारी ने कहा कि जनहित में उठाए गए इस मुद्दे का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि कानून के शासन, नागरिक स्वतंत्रता, पुलिस जवाबदेही और अधिवक्ताओं की गरिमा को सुनिश्चित करना है। अब इस शिकायत के बाद मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से होने वाली कार्रवाई पर नजर बनी हुई है। इस मौके पर अधिवक्ता कुणाल कांत शर्मा, अधिवक्ता पंकज सिंह, मिथिलेश, विकास सहित अन्य अधिवक्ता मौजूद रहे।


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