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*फरीदाबाद,2 अगस्त*
अखिल भारतीय राज्य सरकारी कर्मचारी महासंघ ने आठवें केंद्रीय वेतन आयोग के समक्ष विस्तृत ज्ञापन प्रस्तुत कर देशभर के लगभग 60 लाख राज्य सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों एवं सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की वेतन, भत्तों तथा सेवा शर्तों से संबंधित मांगों को मजबूती से उठाया है। महासंघ ने कहा है कि यद्यपि केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशें सीधे राज्य कर्मचारियों पर लागू नहीं होती, लेकिन देश के अधिकांश राज्य वेतन पुनरीक्षण और सेवा लाभों के निर्धारण में इन्हीं सिफारिशों को आधार बनाते हैं। इसलिए आठवें वेतन आयोग का निर्णय करोड़ों कर्मचारियों और उनके परिवारों के भविष्य को प्रभावित करेगा।
महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष लांबा ने बताया कि आयोग को दिए गए ज्ञापन में स्पष्ट किया गया है कि सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद खाद्य मुद्रास्फीति में लगातार 6 से 8 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि हुई है। शिक्षा पर होने वाला खर्च 10 से 12 प्रतिशत, स्वास्थ्य सेवाओं का व्यय लगभग 8 से 12 प्रतिशत तथा शहरी एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में आवास संबंधी खर्च 8 से 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष बढ़ा है। इसके बावजूद कर्मचारियों के वेतन में वास्तविक जीवन-यापन की आवश्यकताओं के अनुरूप वृद्धि नहीं हुई है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान न्यूनतम वेतन ₹18,000 आज की परिस्थितियों में पूरी तरह अपर्याप्त है। 50 प्रतिशत महंगाई भत्ता जोड़ने पर भी यह राशि लगभग ₹27,000 ही बनती है, जबकि एक सामान्य कर्मचारी परिवार के सम्मानजनक जीवन-यापन के लिए मासिक खर्च ₹30,000 से ₹40,000 या उससे अधिक बैठता है। इसलिए ग्रुप-डी कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन कम से कम ₹40,000 निर्धारित किया जाना समय की आवश्यकता है।
महासंघ ने आठवें वेतन आयोग के समक्ष प्रमुख मांगें रखते हुए कहा है कि फिटमेंट फैक्टर कम से कम 3.8 निर्धारित किया जाए, वार्षिक वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) को वर्तमान 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत किया जाए तथा वेतन मैट्रिक्स में संशोधन कर प्रत्येक 5 से 7 वर्ष में समयबद्ध
वित्तीय उन्नयन की व्यवस्था लागू की जाए। उन्होंने बताया कि
वित्तीय उन्नयन की व्यवस्था लागू की जाए। उन्होंने बताया कि
ज्ञापन में यह भी मांग की गई है कि न्यूनतम एवं अधिकतम वेतन के बीच का अनुपात वर्तमान 1:14 के स्थान पर 1:10 किया जाए तथा वर्तमान 10 वर्षीय वेतन आयोग प्रणाली समाप्त कर प्रत्येक 5 वर्ष में वेतन पुनरीक्षण अनिवार्य किया जाए, ताकि कर्मचारियों का वेतन बढ़ती महंगाई के अनुरूप बना रहे।
सुभाष लांबा ने बताया कि महासंघ ने अपने ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया है कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन पर होने वाला कुल व्यय देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल 2 से 3 प्रतिशत है। इसलिए कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि को राजकोषीय बोझ नहीं, बल्कि आर्थिक विकास, उपभोग क्षमता में वृद्धि, बाजार की मजबूती और राजस्व संग्रह बढ़ाने वाले निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।
सुभाष लांबा ने कहा कि महासंघ ने आयोग को यह भी सुझाव दिया है कि जब राज्य सरकारें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप वेतन संशोधन लागू करें, तो उससे उत्पन्न अतिरिक्त वित्तीय भार का एक हिस्सा केंद्र सरकार वहन करे।

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